
आस्था की भीड़ कब तक प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ेगी?
रिपोर्ट: 27 जुलाई 2025 | हरिद्वार, उत्तराखंड
सावन का रविवार और श्रद्धा की दौड़
27 जुलाई 2025, रविवार। सावन का दूसरा रविवार और हरिद्वार की फिजाओं में हर-हर महादेव की गूंज। सुबह के सात बजे से ही मनसा देवी मंदिर की ओर भक्तों की लंबी कतारें लग चुकी थीं। कुछ कांवड़िए थे, कुछ परिवार के साथ आए श्रद्धालु, कुछ महिलाएं अपने बच्चों को लेकर दर्शन की इच्छा से पहाड़ी की सीढ़ियां चढ़ रही थीं। आसमान साफ़ था, मौसम सुहावना। लेकिन किसी को क्या पता था कि यह दिन उनके जीवन की सबसे भयावह याद बनकर रह जाएगा।
क्या हुआ मंदिर परिसर में?
मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार के बिलकुल बीचोबीच एक पहाड़ी पर स्थित है। यहां रोज़ाना हजारों की संख्या में भक्त आते हैं, लेकिन श्रावण माह में यह संख्या लाखों में पहुंच जाती है। इस बार प्रशासन को अनुमान था कि रविवार को मंदिर में अत्यधिक भीड़ उमड़ेगी, लेकिन अनुमान को योजना में नहीं बदला गया।
सुबह लगभग 8 बजे जब मंदिर की सीढ़ियों पर भीड़ बढ़ने लगी, तब प्रवेश और निकास मार्गों पर नियंत्रण खोने लगा। एक तरफ से श्रद्धालुओं का रेला ऊपर की ओर बढ़ रहा था, दूसरी तरफ नीचे उतरते हुए लोगों की भीड़ टकरा रही थी।
एक छोटी सी चूक — शायद किसी ने अचानक रुक कर आराम किया या संतुलन खोया — और फिर जो हुआ वो किसी डरावने दृश्य से कम नहीं था।
लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे। कुछ महिलाएं बच्चों को उठाए मदद के लिए चिल्लाने लगीं। कई बुजुर्ग ज़मीन पर गिर गए और उन्हें उठाने वाला कोई नहीं था। भीड़ का दबाव इतना ज़्यादा था कि आगे चल रहे लोग संभल ही नहीं पाए और सीढ़ियों पर गिरते चले गए।
दर्दनाक परिणाम: मौतें और चीख-पुकार
इस भगदड़ में अब तक 6 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें दो बच्चे भी शामिल हैं। एक बच्चा अपनी दादी के साथ दर्शन के लिए आया था और मंदिर के बाहर लगी जूते-चप्पल की भीड़ में फंस गया। एक अन्य युवती, जो अपने माता-पिता के साथ दिल्ली से आई थी, सीढ़ियों पर गिर गई और भीड़ ने उसे कुचल डाला।
घायलों की संख्या 25 से अधिक बताई जा रही है, जिनमें से कुछ की हालत गंभीर है। उन्हें हरिद्वार जिला अस्पताल, AIIMS ऋषिकेश, और कुछ को देहरादून रेफर किया गया है।
प्रत्यक्षदर्शियों की आंखों-देखी
हमने मौके पर मौजूद कुछ प्रत्यक्षदर्शियों से बात की। सावित्री देवी, जो बनारस से आई थीं, फूट-फूट कर रोते हुए बोलीं:
“हम तो हर साल आते हैं सावन में, लेकिन ऐसा मंजर कभी नहीं देखा। मेरी बहन वहीं गिर गई थी। जब तक उसे उठाते, दस लोग उसके ऊपर से गुजर चुके थे।”
अनिल कुमार, जो हरियाणा से अपने परिवार के साथ आए थे, ने कहा:
“कोई भी देखने वाला नहीं था। भीड़ बढ़ती रही, पर रोकने वाला कोई नहीं था। पुलिस वाले दूर से देख रहे थे, कुछ कर नहीं पाए।”
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर प्रशासन को पता था कि सावन के रविवार को लाखों श्रद्धालु मनसा देवी में दर्शन को आएंगे, तो भीड़ नियंत्रण की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
गढ़वाल कमिश्नर विनय शंकर पांडे ने बयान दिया:
“श्रावण माह में हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। इस बार असाधारण भीड़ के कारण स्थिति बेकाबू हो गई। भीड़ प्रबंधन में कुछ खामियां जरूर रहीं।”
लेकिन क्या यह खामियां स्वीकार करने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तत्काल SDRF, पुलिस और राहत दल को घटनास्थल पर भेजा।
उन्होंने ट्वीट किया:
“मनसा देवी मंदिर में हुई दुर्घटना अत्यंत दुखद है। सभी घायल श्रद्धालुओं को सर्वोत्तम चिकित्सा सहायता दी जा रही है। मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।”
सिस्टम की पुरानी कमजोरी
यह पहला मौका नहीं है जब धार्मिक स्थानों पर भीड़ के कारण हादसे हुए हैं। इससे पहले भी:
- 2013 में रतंगढ़ माता मंदिर (मध्यप्रदेश) में भगदड़ में 115 से अधिक मौतें हुई थीं।
- 2022 में वैष्णो देवी में नए साल की भीड़ के दौरान भगदड़ में कई श्रद्धालु घायल हुए थे।
- और अब हरिद्वार 2025, इस कड़ी में एक और दुखद अध्याय जुड़ गया।
हर बार प्रशासन “सीखने” की बात करता है, लेकिन ग्राउंड लेवल पर कोई ठोस बदलाव नज़र नहीं आता।
क्या थी घटनास्थल की खामियां?
हमारी ग्राउंड रिपोर्टिंग में निम्नलिखित समस्याएं स्पष्ट रूप से सामने आईं:
- सीढ़ियों पर एकतरफा मार्ग व्यवस्था नहीं थी, जिससे चढ़ने और उतरने वालों की भीड़ टकरा गई।
- भीड़ नियंत्रक बैरिकेडिंग बेहद कमजोर थी और कई जगह टूट चुकी थी।
- पुलिस की संख्या और प्रशिक्षण इस तरह की भीड़ के लिए अपर्याप्त था।
- स्वास्थ्य और आपातकालीन सेवाओं का कोई प्रावधान नहीं था जो मौके पर तुरंत राहत पहुंचा सके।
लोगों में आक्रोश और डर
घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने प्रशासन की कड़ी आलोचना की।
#MansaDeviTragedy, #HaridwarBhagdar जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
श्रद्धालुओं के परिवारों में भय है — “क्या अगली बार भगवान के दर्शन के लिए हमें जान दांव पर लगानी होगी?”
धार्मिक आयोजन और सुरक्षा: संतुलन की ज़रूरत
भारत में धार्मिक आस्था जितनी गहरी है, उतना ही भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा को लेकर तंत्र कमजोर है।
हर बड़े आयोजन — चाहे वो कुम्भ मेला हो या सावन में कांवड़ यात्रा — प्रशासन का रवैया अक्सर “भगवान भरोसे” ही होता है।
यह ज़रूरी है कि:
- प्रवेश और निकास की सख्त योजना बने,
- ऑनलाइन पास सिस्टम या स्लॉट बुकिंग लागू हो,
- वॉलंटियर्स और प्रशिक्षित गार्ड्स की संख्या बढ़े,
- CCTV, ड्रोन्स और भीड़ विश्लेषण तकनीक का इस्तेमाल हो,
- और सबसे ज़रूरी — मौके पर मौजूद पुलिस को संवेदनशील और तत्पर बनाया जाए।
सरकार का अगला कदम क्या होगा?
मुख्यमंत्री धामी ने कहा है कि मृतकों के परिजनों को 5 लाख रुपये मुआवज़ा, घायलों को 50 हजार रुपये की सहायता, और दोषियों की जांच के आदेश दिए गए हैं।
लेकिन सवाल यह है कि:
क्या यह मुआवज़ा खोए हुए जीवन की भरपाई कर सकता है? क्या यही आखिरी हादसा होगा?
निष्कर्ष: आस्था के नाम पर लापरवाही कब तक?
मनसा देवी मंदिर, जहां लोग हर साल अपनी मनोकामनाएं लेकर जाते हैं, आज शोक स्थल बन गया। जिन पवित्र कदमों से सीढ़ियां चढ़नी थीं, वहीं खून और चप्पलों की बिखरी हुई कतारें उस सुबह की खौफनाक तस्वीरें बता रही थीं।
सरकार को अब सिर्फ मुआवज़ा देने से ज़्यादा करना होगा।
धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन को “अपराध नियंत्रण” से अलग एक स्वतंत्र प्राथमिकता दी जाए।
जो लोग मंदिरों में शांति की तलाश में जाते हैं, उन्हें हादसों में जान गंवाने का डर नहीं होना चाहिए।
रिपोर्ट: [आपका नाम/स्रोत] | हरिद्वार से ग्राउंड रिपोर्ट
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